माँ की आख़िरी चिट्ठी
शहर के आख़िरी छोर पर एक छोटी-सी बस्ती थी।
बस्ती के बीचों-बीच एक कच्चा रास्ता था, जिसके दोनों तरफ मिट्टी और ईंटों से बने छोटे-छोटे घर थे। उन्हीं घरों में से एक घर ऐसा था, जिसकी दीवारों पर बारिश के निशान थे और छत पर जगह-जगह पुराने टीन के टुकड़े लगे थे।
उस घर में एक माँ और उसका बेटा रहते थे।
माँ का नाम था—सरस्वती।
और बेटे का नाम—अमन।
अमन की उम्र तब केवल दस साल थी।
उसके पिता का देहांत कई साल पहले हो चुका था। उस समय अमन इतना छोटा था कि उसे अपने पिता का चेहरा भी ठीक से याद नहीं था।
उसे बस इतना याद था कि उसके पिता उसे कंधे पर बैठाकर मेले में ले जाते थे।
एक दिन उसने माँ से पूछा था,
“माँ, पापा मुझे कंधे पर क्यों बैठाते थे?”
सरस्वती मुस्कुराई थी।
“क्योंकि तू उनका सबसे बड़ा खज़ाना था।”
“और आप?”
सरस्वती कुछ पल चुप रही।
फिर उसके बाल सहलाते हुए बोली,
“मैं भी।”
अमन हँस पड़ा।
उसे क्या पता था कि माँ अपने हिस्से का दुख हमेशा मुस्कुराकर छुपा लेती है।
सरस्वती लोगों के घरों में काम करती थी। सुबह अँधेरे में उठती, चूल्हा जलाती, अमन के लिए खाना बनाती और फिर काम पर चली जाती।
अमन रोज़ स्कूल जाने से पहले दरवाज़े पर खड़ा होकर माँ का इंतज़ार करता।
“माँ, आज जल्दी आना।”
सरस्वती हँसकर कहती,
“हाँ, मेरे राजा।”
“सच?”
“बिल्कुल सच।”
अमन हर दिन यही सवाल करता था।
और सरस्वती हर दिन यही जवाब देती थी।
उसे नहीं पता था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब वह सवाल तो वही करेगा, लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं होगा।
अमन पढ़ने में बहुत अच्छा था।
उसका सपना था कि वह बड़ा होकर शहर में नौकरी करेगा और अपनी माँ के लिए एक पक्का घर बनाएगा।
एक दिन स्कूल से लौटकर उसने माँ से कहा,
“माँ, मैं बड़ा होकर बहुत पैसे कमाऊँगा।”
सरस्वती ने हँसते हुए पूछा,
“कितने?”
“बहुत सारे।”
“इतने सारे कि?”
“कि आपको काम नहीं करना पड़ेगा।”
सरस्वती कुछ देर उसे देखती रही।
फिर बोली,
“बस इतना ही चाहिए मुझे।”
अमन ने पूछा,
“और क्या चाहिए?”
सरस्वती ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।
“तू खुश रहे।”
अमन को माँ की यह बात समझ नहीं आई।
उसके लिए खुशी का मतलब था—नया बैग, नई किताबें और कभी-कभी मिठाई।
लेकिन माँ के लिए खुशी का मतलब था—बेटे का भविष्य।
सरस्वती हर महीने अपनी कमाई में से थोड़ा-थोड़ा पैसा बचाती थी।
एक पुराने लोहे के डिब्बे में।
अमन को लगता था कि उसमें घर के कागज़ रखे हैं।
लेकिन उस डिब्बे में एक छोटी-सी पोटली थी।
उस पोटली में पैसे नहीं, बल्कि अमन के भविष्य के लिए जमा की गई उसकी माँ की उम्मीदें थीं।
एक दिन अमन ने वह डिब्बा खोल लिया।
“माँ, इसमें क्या है?”
सरस्वती घबरा गई।
“कुछ नहीं।”
“पैसे हैं?”
“तुझे इससे क्या मतलब?”
“मैं भी देखूँगा।”
माँ ने डिब्बा बंद कर दिया।
“जब तू बड़ा हो जाएगा, तब खोलना।”
अमन ने मुँह बना लिया।
“आप भी ना…”
सरस्वती हँस पड़ी।
“हाँ, मैं भी ना।”
उस रात जब अमन सो गया, सरस्वती ने वही डिब्बा खोला।
उसमें कुछ नोट थे।
और एक कागज़।
कागज़ पर उसने लिखा था—
“अमन की पढ़ाई के लिए।”
उसने कागज़ को मोड़ा और वापस रख दिया।
फिर बेटे को सोते हुए देखा।
उसकी आँखों में आँसू थे।
लेकिन चेहरे पर मुस्कान।
समय बीतता गया।
अमन बड़ा होता गया।
उसकी पढ़ाई अच्छी होती गई।
बारहवीं की परीक्षा में उसके बहुत अच्छे अंक आए।
उसे शहर के एक बड़े कॉलेज में दाखिला मिल गया।
जब उसे यह खबर मिली, वह भागता हुआ घर आया।
“माँ!”
सरस्वती आँगन में कपड़े धो रही थी।
“क्या हुआ?”
“मेरा दाखिला हो गया!”
सरस्वती के हाथ रुक गए।
“सच?”
“हाँ!”
अमन ने कागज़ माँ के सामने रख दिया।
सरस्वती ने उसे पढ़ने की कोशिश की, लेकिन आँखों में आँसू आ गए।
“माँ, आप रो क्यों रही हैं?”
“खुशी के आँसू हैं।”
“सच?”
“हाँ।”
अमन ने माँ को गले लगा लिया।
उस दिन दोनों बहुत देर तक चुपचाप बैठे रहे।
रात में सरस्वती ने वही पुराना लोहे का डिब्बा खोला।
उसमें जमा पैसे बहुत कम थे।
कॉलेज की फीस के लिए पर्याप्त नहीं।
उसने अपनी शादी की आख़िरी निशानी—एक छोटी-सी चाँदी की पायल—निकाली।
अगले दिन वह उसे बेच आई।
अमन को कुछ नहीं बताया।
शहर जाने से एक दिन पहले अमन माँ के पास बैठा था।
“माँ, मैं जल्दी लौटूँगा।”
“हूँ।”
“आप अकेली रहेंगी।”
“मैं अकेली कहाँ हूँ? मेरा बेटा तो मेरे साथ रहेगा।”
“लेकिन मैं तो शहर में रहूँगा।”
सरस्वती मुस्कुराई।
“बेटे माँ से दूर कहाँ जाते हैं?”
अमन ने माँ की बात को मज़ाक समझकर हँस दिया।
अगली सुबह वह शहर चला गया।
सरस्वती दरवाज़े पर खड़ी उसे देखती रही।
बस आँखों से ओझल हो गई।
लेकिन माँ की आँखें रास्ते पर ही टिकी रहीं।
शहर में अमन की जिंदगी बदल गई।
नई दुनिया थी।
नए दोस्त थे।
नई पढ़ाई थी।
नई महत्वाकांक्षाएँ थीं।
शुरुआत में वह रोज़ माँ को फोन करता।
“माँ, खाना खाया?”
“हाँ।”
“दवाई ली?”
“हाँ।”
“घर में सब ठीक है?”
“सब ठीक है।”
लेकिन धीरे-धीरे फोन कम होने लगे।
पहले रोज़।
फिर दो दिन में एक बार।
फिर सप्ताह में।
और फिर…
कभी-कभी पूरा महीना निकल जाता।
सरस्वती हर बार फोन के पास बैठकर इंतज़ार करती।
जब फोन बजता, वह सबसे पहले यही कहती,
“अमन?”
लेकिन कई बार दूसरी तरफ कोई और होता।
एक दिन डाकिया उसके घर एक चिट्ठी लेकर आया।
“सरस्वती देवी?”
“हाँ।”
“आपके बेटे की चिट्ठी है।”
सरस्वती ने काँपते हाथों से चिट्ठी ली।
अमन ने लिखा था—
“माँ, यहाँ सब अच्छा है। आप अपना ध्यान रखना। मैं बहुत मेहनत कर रहा हूँ। एक दिन आपको शहर बुलाऊँगा। आपका बेटा—अमन।”
सरस्वती ने वह चिट्ठी कई बार पढ़ी।
फिर उसे मोड़कर अपनी साड़ी के पल्लू में रख लिया।
उस दिन उसने खाना भी ठीक से नहीं खाया।
बस मुस्कुराती रही।
जैसे अमन घर में ही हो।
उसके बाद सरस्वती ने भी चिट्ठियाँ लिखना शुरू कर दिया।
लेकिन भेजती नहीं थी।
कभी लिखती—
“बेटा, आज तेरी बहुत याद आई।”
फिर कागज़ फाड़ देती।
कभी लिखती—
“बेटा, तू बहुत अच्छा कर रहा है।”
फिर उसे संभालकर रख देती।
कभी लिखती—
“घर की छत फिर टपक रही है।”
फिर वह पत्र भी फाड़ देती।
उसे डर था कि कहीं बेटा अपनी पढ़ाई छोड़कर उसके पास वापस न आ जाए।
माँ की सबसे बड़ी आदत होती है—
वह अपनी तकलीफ़ बच्चे से छुपा लेती है।
कॉलेज खत्म हुआ।
अमन को एक अच्छी नौकरी मिल गई।
उसकी जिंदगी बदल गई।
अब उसके पास अच्छा कमरा था।
अच्छे कपड़े थे।
अच्छा फोन था।
और धीरे-धीरे…
माँ के लिए समय कम हो गया।
सरस्वती अब बूढ़ी हो रही थी।
उसके बाल सफेद हो चुके थे।
हाथों की नसें उभर आई थीं।
लेकिन जब भी कोई पूछता,
“तुम्हारा बेटा क्या करता है?”
उसका चेहरा गर्व से भर जाता।
“शहर में बड़ी नौकरी करता है।”
एक पड़ोसन ने पूछा,
“तुम्हें अपने पास नहीं बुलाता?”
सरस्वती कुछ पल चुप रही।
फिर बोली,
“बुलाएगा।”
“कब?”
सरस्वती मुस्कुरा दी।
“जब उसे फुर्सत मिलेगी।”
वह जानती थी कि अमन व्यस्त है।
या शायद वह खुद को यही समझाती थी।
एक दिन उसे तेज़ बुखार था।
पड़ोस की रमा उसे डॉक्टर के पास ले गई।
डॉक्टर ने कहा,
“आराम की जरूरत है।”
सरस्वती ने पूछा,
“बहुत बड़ी बीमारी तो नहीं है?”
डॉक्टर ने कहा,
“आपको अपना ध्यान रखना होगा।”
घर लौटकर उसने सबसे पहले अमन को फोन किया।
फोन नहीं उठा।
उसने फिर किया।
फिर भी नहीं उठा।
सरस्वती ने फोन अपने पास रखा और बिस्तर पर लेट गई।
कुछ देर बाद फोन बजा।
अमन था।
“माँ, फोन किया था?”
“हाँ बेटा।”
“मैं मीटिंग में था।”
“अच्छा।”
“कुछ काम था?”
सरस्वती ने कुछ पल चुप रहकर कहा,
“नहीं।”
“तो बाद में बात करता हूँ, ठीक है?”
“ठीक है बेटा।”
फोन कट गया।
सरस्वती ने फोन को सीने से लगा लिया।
धीरे से बोली,
“बस तेरी आवाज़ सुननी थी।”
कुछ महीने बाद अमन पहली बार कई वर्षों के बाद गाँव आया।
वह कार से उतरा।
महँगे कपड़े पहने हुए।
हाथ में बड़ा बैग था।
माँ दरवाज़े पर खड़ी थी।
उसे देखते ही उसकी आँखें चमक उठीं।
“अमन!”
अमन ने माँ के पैर छुए।
“कैसी हो?”
“अब ठीक हूँ।”
“कमज़ोर लग रही हो।”
“उम्र हो गई है।”
अमन ने घर देखा।
दीवारें पुरानी थीं।
छत कमजोर थी।
आँगन में वही पुरानी चारपाई थी।
“माँ, आप यहाँ अकेली कैसे रहती हैं?”
“रह जाती हूँ।”
“मैं आपको शहर ले जाऊँगा।”
सरस्वती ने उसकी तरफ देखा।
“सच?”
“हाँ।”
उस रात माँ बहुत खुश थी।
उसने वर्षों बाद अपने बेटे के लिए उसकी पसंद की खिचड़ी बनाई।
अमन खाते हुए बोला,
“माँ, बिल्कुल पहले जैसी।”
सरस्वती मुस्कुराई।
“माँ का खाना कभी पुराना होता है क्या?”
अमन भी हँस पड़ा।
लेकिन अगले दिन उसे ऑफिस से फोन आ गया।
कुछ जरूरी काम था।
उसे वापस जाना पड़ा।
दरवाज़े पर खड़ी माँ ने पूछा,
“कब आओगे?”
अमन ने जल्दी में कहा,
“जल्दी।”
“कितनी जल्दी?”
“बस… जल्दी।”
माँ ने मुस्कुराकर सिर हिला दिया।
वह जानती थी कि “जल्दी” कभी-कभी बहुत लंबा समय होता है।
सर्दियों की एक सुबह सरस्वती ने फिर वही पुराना लोहे का डिब्बा निकाला।
उसने अमन की पहली चिट्ठी बाहर निकाली।
फिर एक सफेद कागज़ लिया।
और लिखना शुरू किया।
“मेरे अमन,
बहुत दिनों से तुझे कुछ कहना चाहती हूँ।
तू जब छोटा था ना, तब रोज़ पूछता था—माँ, मैं बड़ा होकर क्या बनूँगा?
मैं कहती थी—अच्छा इंसान।
आज तू बहुत बड़ा आदमी बन गया है।
मुझे तुझ पर गर्व है।
बस एक बात कहना चाहती हूँ।
पैसे कमाने में इतना मत खो जाना कि घर लौटने का रास्ता भूल जाए।
क्योंकि घर में कोई तेरा इंतज़ार करता है।
मैंने तेरे लिए बहुत कुछ बचाकर रखा है।
पैसे नहीं।
तेरी बचपन की बातें।
तेरी पहली किताब।
तेरी टूटी हुई पेंसिल।
वह नीला रुमाल जो तू स्कूल जाते समय भूल गया था।
और तेरी पहली चिट्ठी।
सब कुछ।
बस एक चीज़ बचाकर नहीं रख पाई—अपनी उम्र।
वह धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है।
अगर कभी समय मिले तो आ जाना।
मैं तुझे कुछ नहीं कहूँगी।
बस थोड़ी देर तेरे पास बैठूँगी।
तेरी माँ।”
चिट्ठी लिखकर उसने उसे लिफाफे में रखा।
लेकिन पोस्ट करने के लिए उठी नहीं।
वह मुस्कुराई।
“अमन आएगा तो खुद दे दूँगी।”
उसने चिट्ठी लोहे के डिब्बे में रख दी।
दिन बीतते गए।
अमन नहीं आया।
सरस्वती रोज़ शाम को दरवाज़े के पास बैठती।
सड़क की तरफ देखती।
कभी कोई मोटरसाइकिल गुजरती तो वह उठ जाती।
कभी किसी कार की आवाज़ आती तो वह दरवाज़े तक चली जाती।
फिर वापस आ जाती।
रमा ने एक दिन पूछा,
“किसका इंतज़ार करती हो?”
सरस्वती ने कहा,
“बेटे का।”
“फोन कर लो।”
“करती हूँ।”
“आता क्यों नहीं?”
सरस्वती ने मुस्कुराकर कहा,
“बहुत काम होगा।”
उस दिन रमा की आँखें भर आईं।
माँ अपने बेटे की व्यस्तता का बचाव कर रही थी।
जबकि बेटा खुद वहाँ नहीं था।
एक रात अमन ऑफिस में था।
उसका फोन बजा।
रमा का फोन था।
उसने उठाया नहीं।
कुछ देर बाद फिर फोन आया।
इस बार उसने उठा लिया।
“हैलो?”
दूसरी तरफ से रोती हुई आवाज़ आई।
“अमन…”
“जी?”
“तुम… जल्दी घर आ जाओ।”
अमन चुप हो गया।
“माँ की तबीयत बहुत खराब है।”
“क्या हुआ?”
“बस… तुम आ जाओ।”
अमन ने उसी रात टिकट लिया।
सुबह वह गाँव पहुँचा।
लेकिन घर के बाहर भीड़ थी।
उसका दिल बैठ गया।
वह अंदर गया।
माँ की चारपाई खाली थी।
उसके पास एक सफेद कपड़ा रखा था।
अमन वहीं बैठ गया।
“माँ?”
कोई जवाब नहीं।
उसकी आँखों के सामने बचपन घूम गया।
“माँ, आज जल्दी आना।”
“हाँ, मेरे राजा।”
“माँ, मैं बड़ा होकर बहुत पैसे कमाऊँगा।”
“बस खुश रहना।”
“माँ, आप मेरे साथ शहर चलोगी?”
“जहाँ मेरा बेटा, वहीं मेरा घर।”
अमन की आँखों से आँसू बहने लगे।
वह चारपाई से सिर लगाकर रो पड़ा।
इतने वर्षों में पहली बार उसे समझ आया—
माँ के पास समय कम था।
और उसके पास…
समय होते हुए भी उसने उसे नहीं दिया।
रमा ने अमन को वह पुराना लोहे का डिब्बा दिया।
“तुम्हारी माँ ने कहा था, यह तुम्हें देना।”
अमन ने काँपते हाथों से डिब्बा खोला।
सबसे ऊपर उसकी पहली चिट्ठी थी।
फिर उसकी पुरानी किताब।
एक टूटी हुई पेंसिल।
नीला रुमाल।
और बहुत सारी छोटी-छोटी चिट्ठियाँ।
अमन एक-एक करके पढ़ने लगा।
पहली चिट्ठी—
“आज अमन का जन्मदिन है। उसने मिठाई माँगी थी। पैसे कम थे। फिर भी उसके लिए मिठाई लाई। वह बहुत खुश था।”
दूसरी—
“आज अमन पहली बार स्कूल गया। मुझे छोड़कर अंदर चला गया। मैं बाहर खड़ी होकर बहुत रोई। वह पीछे मुड़कर नहीं देख रहा था। शायद उसे पता नहीं था कि माँ का दिल कितना डरता है।”
तीसरी—
“आज अमन को कॉलेज में दाखिला मिला। मैंने अपनी पायल बेच दी। उसे मत बताना।”
अमन का हाथ काँपने लगा।
फिर एक और चिट्ठी।
“आज अमन ने फोन नहीं किया। शायद व्यस्त होगा। भगवान उसे खुश रखना।”
एक और।
“आज बहुत बुखार था। अमन को नहीं बताया। उसकी चिंता बढ़ जाएगी।”
फिर एक और।
“आज घर में बहुत शांति है। कभी-कभी लगता है, इस घर में मेरी आवाज़ भी मुझे अजनबी लगती है।”
अमन चिट्ठियाँ पढ़ता गया।
हर पन्ने के साथ उसकी आँखों से आँसू गिरते गए।
सबसे नीचे एक लिफाफा था।
उस पर लिखा था—
“मेरे अमन के लिए — आख़िरी चिट्ठी।”
अमन ने लिफाफा खोला।
उसमें माँ की लिखावट थी।
“मेरे प्यारे अमन,
अगर तू यह चिट्ठी पढ़ रहा है तो शायद मैं तेरे सामने नहीं हूँ।
लेकिन दुखी मत होना।
माँ कभी अपने बच्चे से दूर नहीं जाती।
वह बस दिखाई देना बंद कर देती है।
मुझे नहीं पता तू मुझे याद करेगा या नहीं।
लेकिन मैंने तुझे कभी भूलना सीखा ही नहीं।
तू छोटा था तो तेरे जूते मैं साफ करती थी।
तू बड़ा हुआ तो तेरे सपने साफ करती रही।
तू शहर चला गया तो तेरी राह देखती रही।
लोग कहते रहे कि बेटा दूर हो गया।
मैं कहती रही—नहीं, मेरा बेटा बस व्यस्त है।
मैंने हमेशा तेरी तरफ़ से सफाई दी।
क्योंकि माँ अपने बच्चे से शिकायत नहीं करती।
उसे बस इंतज़ार करना आता है।
एक बात का अफसोस है।
तू जब छोटा था, तब तू मुझे बहुत बार कहता था—माँ, मेरे पास बैठो।
और मैं बैठ जाती थी।
फिर तू बड़ा हो गया।
मैं तुझसे कहती रही—बेटा, मेरे पास बैठ जा।
और तू कहता रहा—माँ, अभी काम है।
काश एक दिन तूने अपना काम छोड़कर मेरे पास बैठना चुना होता।
लेकिन मैं तुझसे नाराज़ नहीं हूँ।
मुझे तुझ पर आज भी उतना ही गर्व है।
तूने जो कमाया, वह सब तेरा है।
लेकिन जो मैंने बचाकर रखा है, वह सिर्फ़ तेरा नहीं है।
वह मेरी पूरी जिंदगी है।
उसे संभालकर रखना।
और हाँ…
अगर कभी बहुत अकेला महसूस हो, तो उस पुराने घर में आ जाना।
आँगन की मिट्टी में तेरे बचपन के कदम हैं।
दीवार पर तेरी ऊँचाई के निशान हैं।
रसोई में तेरी पसंद की खुशबू अब भी होगी।
और मेरी चारपाई के पास शायद तुझे वह आवाज़ सुनाई दे—
‘बेटा, खाना खा ले।’
तू तब खाना खा लेना।
क्योंकि माँ की बात कभी टालनी नहीं चाहिए।
और एक बात…
अपने बच्चों के लिए समय निकालना।
उन्हें पैसे से ज्यादा तुम्हारी मौजूदगी की जरूरत होगी।
मुझे खुशी होगी अगर मेरी जिंदगी से तू यह सीख पाए।
मैंने तुझे दुनिया में लाया था।
लेकिन तूने मुझे माँ बनाया।
इसके लिए धन्यवाद।
तेरी माँ।”
चिट्ठी खत्म हो गई।
लेकिन अमन की आँखों से आँसू नहीं रुके।
उसने चिट्ठी को सीने से लगा लिया।
“माँ…”
उसकी आवाज़ टूट गई।
“माँ, एक बार वापस आ जाओ।”
कमरे में सन्नाटा था।
कोई जवाब नहीं आया।
पहली बार अमन को समझ आया कि दुनिया में सबसे महँगी चीज़ पैसा नहीं…
समय है।
और कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें हम समय देना चाहते हैं…
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
अमन ने नौकरी नहीं छोड़ी।
लेकिन उसने अपनी जिंदगी बदल दी।
वह हर महीने गाँव आता।
माँ के घर की मरम्मत करवाई।
छत ठीक करवाई।
आँगन में एक नीम का पेड़ लगाया।
और घर के बाहर एक छोटी-सी पट्टी लगवाई—
“सरस्वती निवास”
लेकिन उसके लिए वह सिर्फ़ घर नहीं था।
वह उसकी माँ की पूरी दुनिया थी।
कुछ महीनों बाद उसने उसी घर के एक हिस्से में बच्चों के लिए छोटी-सी लाइब्रेरी शुरू कर दी।
दीवार पर उसने माँ की एक तस्वीर लगाई।
तस्वीर के नीचे लिखा—
“जिस माँ ने अपने बेटे की पढ़ाई के लिए अपनी खुशियाँ बचाईं, उसी के नाम।”
गाँव के बच्चे रोज़ वहाँ पढ़ने आने लगे।
एक दिन एक छोटा बच्चा किताब लेकर अमन के पास आया।
“अंकल, मेरी माँ कहती है कि पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना।”
अमन मुस्कुराया।
“बड़ा आदमी नहीं…”
वह कुछ पल रुका।
फिर बोला,
“अच्छा इंसान बनना।”
बच्चा मुस्कुराकर चला गया।
अमन की आँखें तस्वीर पर टिक गईं।
उसे लगा जैसे माँ मुस्कुरा रही हो।
कई साल बाद भी अमन जब गाँव आता, तो शाम को उसी दरवाज़े पर बैठता।
जहाँ कभी उसकी माँ बैठकर उसका इंतज़ार करती थी।
सड़क पर कोई कार गुजरती।
वह अनायास उसकी तरफ देखता।
फिर मुस्कुरा देता।
उसे पता था…
अब माँ कभी दरवाज़े पर खड़ी होकर नहीं कहेगी—
“आ गया बेटा?”
लेकिन हर बार जब हवा नीम के पेड़ की पत्तियों को हिलाती, अमन को लगता जैसे कोई बहुत दूर से पुकार रहा हो—
“बेटा…”
वह आँखें बंद कर लेता।
और धीरे से जवाब देता—
“हाँ माँ…”
फिर कुछ पल चुप रहता।
“आज मैं जल्दी आ गया।”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगते।
लेकिन इस बार वह आँसू छुपाता नहीं था।
क्योंकि अब उसे समझ आ चुका था—
कुछ आँसू कमजोरी नहीं होते।
वे उन रिश्तों की कीमत होते हैं, जिन्हें हमने देर से समझा।
उसने माँ की आख़िरी चिट्ठी हमेशा अपने पास रखी।
वह चिट्ठी पुरानी हो गई थी।
कागज़ पीला पड़ गया था।
किनारे मुड़ गए थे।
लेकिन माँ की लिखावट अब भी साफ थी।
हर बार उसे पढ़ते हुए अमन एक ही जगह आकर रुक जाता—
“मैंने तुझे दुनिया में लाया था, लेकिन तूने मुझे माँ बनाया।”
और हर बार वह चिट्ठी आँखों से लगाकर कहता—
“माँ, मुझे माफ़ कर देना।”
हवा चलती।
नीम की पत्तियाँ सरसरातीं।
और ऐसा लगता जैसे कोई बहुत प्यार से कह रहा हो—
“माँ अपने बच्चों को माफ़ नहीं करती बेटा… माँ तो बस उन्हें प्यार करती है।”
उस दिन अमन बहुत देर तक उसी दरवाज़े पर बैठा रहा।
सूरज ढल गया।
आसमान में अँधेरा उतर आया।
लेकिन वह उठा नहीं।
क्योंकि उसे लगा…
शायद आज भी उसकी माँ अंदर रसोई में होगी।
शायद चूल्हे पर कुछ रखा होगा।
शायद वह थोड़ी देर में बाहर आकर कहेगी—
“इतनी देर से बैठे हो, खाना नहीं खाना क्या?”
अमन ने आँसू पोंछे।
दरवाज़े की तरफ देखा।
और बहुत धीरे से बोला—
“माँ… आज बहुत भूख लगी है।”
घर शांत था।
कोई जवाब नहीं आया।
फिर भी अमन उठकर अंदर चला गया।
रसोई में वही पुराना चूल्हा था।
वही दीवार।
वही खिड़की।
और उसी कोने में माँ की तस्वीर।
उसने चूल्हे के पास बैठकर आँखें बंद कर लीं।
उसे माँ की आवाज़ सुनाई दी—
“बेटा, खाना खा ले…”
और उस रात, कई वर्षों बाद, अमन ने खाना खाते हुए पहली बार महसूस किया—
माँ चली गई थी…
लेकिन माँ का प्यार कहीं नहीं गया था।
वह उसके हर निवाले में था।
हर आँसू में था।
हर साँस में था।
और उस पुराने घर की दीवारों में आज भी एक कहानी लिखी थी—
एक माँ की कहानी, जिसने पूरी जिंदगी अपने बेटे का इंतज़ार किया।
और एक बेटे की कहानी, जिसने माँ को बहुत देर से समझा।
क्योंकि दुनिया में सबसे दर्दनाक विदाई वह नहीं होती, जब कोई चला जाता है।
सबसे दर्दनाक वह होती है, जब हम चाहें कि काश एक बार और मिल पाते…
लेकिन तब हमारे पास कहने के लिए सिर्फ़ एक चिट्ठी बची होती है।
माँ की आख़िरी चिट्ठी।
लेखक – रुपेश कुमार (P.G.- Hindi)